न्यू इंडिया में बैल व गौमाता की आप बीती! मैं जाऊं तो जाऊं कहाँ ?


विवेक मालवीय – मेँ भारतीय जुबान के हिसाब सिर्फ गौ माता क्यूंकि अब कोई मेरी व्यथा को नहीं समझता मेँ सिर्फ और सिर्फ मतलब से गौ माता रह गई किसी को अगर फोटो खिचवाना हो तो गौ माता, अपने मतलब से मुझे दूध देने तक घर मेँ रखते है जैसे ही दूध देना बंद किया वापस वहीं रास्ते पर छोड़ देते हैं वैसे यही हाल बैल का भी,खेत मे जाने पर लोग लाठियों से पीटते है। घरों से तो बहुत पहले ही मुझें निकाल दिया गया था। हज़ारों सालों से मैने किसान और इंसान का साथ दिया, पालतू बनकर रहा । मेरी जाति का दूध दही पनीर घी माखन छाछ आज भी मानव जाति प्रयोग करती है

मेरी चमड़ी मेरी हड्डी, मेरा मूत्र, मेरा गोबर हर चीज़ मेरा कतरा कतरा मानव जाति को समर्पित रहा है। मैं ही मानव जाति का ट्रैक्टर व कार जीप बनकर उनको 21वी सदी तक लाया हूँ, लेकिन अफसोस आजकल अधिकतर लोग मेरी जगह कुत्ता पालते है व मैं कुत्ते की जगह गली गली मारा है व मे व मारा फिरता हूँ व कुछ लोग मुझसे नफरत करते है मुझे मारकर भी खा जाते है । यही मेरी व्यथा है जिसे कोई नही सुनता है ।

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